यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में बहुत सी लड़कियां पितृसत्ता, दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न की शिकार हैं, जो उनके विकास को सीमित करती हैं। परन्तु हमारे समाज में कुछ ऐसी महिलाएं है जो जागरूकता, अभियान और अन्य महान पहलों के माध्यम से हजारों लड़कियों के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास कर रही हैं.

शांति मुर्मू

मुर्मू ओडिशा की एक आदिवासी लड़की है जो बालिका शिक्षा, बाल विवाह और पीरियड्स के आसपास के मिथकों को तोड़ रही हैं और उन्होंने महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के लिए पुरुषों द्वारा शराब की अधिकता से संबंधित समस्याओं से निपटने के लिए अपने समुदाय में परिवर्तन की स्थापना करि है.

वह भी व्यक्तिगत रूप से लोगों को एक लड़की की स्वास्थ्य को बनाए रखने की आवश्यकता के बारे में सलाह देती है. उनके अनुसार हिंसा को रोका जाना चाहिए और उनके अनुसार शिक्षा सभी के लिए होनी चाहिये न सिर्फ लड़कों के लिए.

डॉ हर्षिंदर कौर

डॉ हर्षिंदर कौर लुधियाना की बाल रोग विशेषज्ञ और लेखिका हैं जिन्होंने 300 से ज्यादा लड़कियों को अपनाया है और पंजाब में कन्या भ्रूण हत्या की बुराई से लड़ते हुए लगभग 15 साल बिताए हैं।

वह भावुक हो गई थी जब उन्होंने देखा कि कुछ कुत्ते कचरे के डिब्बे में फेंकी एक नवजात शिशु के शरीर को खा रहे थे . ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि बच्ची को उसकी मां ने फेंक दिया था क्योंकि मां के ससुराल वालों ने उसे और उसकी तीन बड़ी बेटियों को बाहर करने की धमकी दी थी अगर उसने किसी और लड़की को जन्म दिया हो।

अब तक कौर ने 223 स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक कार्यों में लोगों को संबोधित किया है। वह अपना संदेश प्रसारित करने के लिए रेडियो और टेलीविजन का उपयोग करती हैं. इन विषयों पर उनके लेख व्यापक रूप से भारत और विदेशों में विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

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रुबीना मज़हर

वह सफा की संस्थापक और सीईओ हैं. यह एक ऐसा संगठन है जो आय पैदा करने और शिक्षा द्वारा महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण में विश्वास करता है और इसी दिशा में काम करता है। उनका संगठन लड़कियों पर ध्यान देने के साथ गरीबी रेखा के नीचे परिवारों से आने वाले बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यमिक शिक्षा का आयोजन करता है। वे कॉलेज की शिक्षा के लिए युवा लड़कियों को भी प्रायोजित करता है.

सैफीना हुसैन

सैफीना हुसैन लड़कियों को शिक्षित करने वाली महिला है। एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता, हुसैन की शिक्षित लड़कियां वर्तमान में भारत के 15 जिलों में 21,000 से अधिक स्कूलों के साथ काम करती हैं। अब तक संगठन ने स्कूलों में 200,000 से अधिक लड़कियों को नामांकित किया है.

लड़कियों को शिक्षित करना तीन उद्देश्यों पर केंद्रित है – लड़कियों के नामांकन और प्रतिधारण में वृद्धि और सभी बच्चों के लिए बेहतर सीखने की टेक्निक्स।

अदिति गुप्ता

पीरियड्स और इसके आस पास लगे कलंक कई लड़कियों को विद्यालयों में जाने, शिक्षा प्राप्त करने, कई गतिविधियों में भाग लेने और एक सामान्य जीवन जीने से रोकते हैं. इन लड़कियों के जीवन में सुधार की जरूरत को पहचानते हुए अदिति गुप्ता और तुहिन पॉल ने 2013 में माइनस्ट्राप्डिया शुरू कर दिया। यह एक संपूर्ण कॉमिक बुक है, जो न केवल भारत में बल्कि 15 अन्य देशों में प्रमुख है और छात्र और छात्राओं को पीरियड्स के विषय में सही ज्ञान देता है और उसके आस पास लगे कलंक को मिटाने का प्रयास करता है.

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