लुधियाना स्थित बाल चिकित्सक और लेखक डॉ हर्षिंदर कौर ने 300 से ज्यादा लड़कियों को अपनाया है और पंजाब में महिला कन्या भ्रूण हत्या की बुराई से लड़ने में 15 साल बिताए हैं।

उन्होंने अपने काम के लिए धीहीन पंजाब दि सम्मान, भारत सरकार से रानी झांसी पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय महिला अधिकार कार्यकर्ता पुरस्कार, भगत पुराण सिंह पुरस्कार, ओर बाबा फरीद विरसता पुरस्कार सहित कई पुरस्कार जीते हैं और हाल ही में 100 महिला और बाल विकास मंत्रालय पुरस्कार के लिए नामांकित महिलाओं में से एक हैं.

Dr Harshinder Kaur

आपने लड़कियों को बचाने के मुद्दे को ही क्यों चुना?

मैंने अपने पति, डॉ गुरपाल सिंह के साथ पंजाब के एक दूरदराज के इलाके में एक मेडिकल कैंप में भाग लिया. इस बात को २० साल हो गए परन्तु वहां मैंने कुछ ऐसा देखा जो मुझे अभी भी परेशान करता है.

गांव के बाहर, एक कचरा डंप पर कुछ कुत्ते एक नवजात शिशु के शरीर को फाड़ रहे थे। गांव के लोगों ने हमें बताया कि बच्चे की माँ ने उसे फेंक दिया था क्यूंकि उनके ससुराल वालों ने उन्हें धमकी दी थी कि यदि वह फिर से एक लड़की को जन्म देंगी तो वह उनकी पहली तीन बेटियों और उन्हें घर से बाहर कर देंगे.

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मैं अपने परिवार का पांचवां बच्चा और चौथी बेटी हूं. मेरे घर में कभी भी मेरे लिंग के कारण मैंने किसी भी प्रकार का भेदभाव का सामना नहीं किया। यह पहली बार था कि मुझे स्त्री भृणहत्या और शिशुहत्या के गंभीर खतरा से सामना करना पड़ा। इस दुखद घटना ने मुझे जीवन में अपना मिशन दिया और मैंने अपना आखिरी श्वास तक लड़कियों को बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित करने का फैसला किया।

Fierce Campaigner For The Girl Child, Dr Harshinder Kaur

आपने कई पुरस्कार जीते हैं उनमें से कौन सा आपके दिल के सबसे करीब है?

हर पुरस्कार और सम्मान मेरे लिए प्रिय है, लेकिन जनवरी 2016 में भारत के राष्ट्रपति से मैंने एक पुरस्कार प्राप्त किया था और उनके साथ दोपहर का खाना विशेष था।

एक बार एक पंजाब के एक दूरदराज के गांव के एक वृद्ध किसान मेरे भाषणों से इतने प्रभावित हो गए कि वह मेरे लिए साग का एक बर्तन और घर का बना खीर ले आये. यह सम्मान मेरे दिल के बहुत करीब है.

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आप किस प्रकार के कार्यक्रम और जागरूकता कार्यों का आयोजन करती हैं?

मैं गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित सामाजिक आउटरीच कार्यक्रमों में भाग लेती हूं और लैंगिक भेदभाव के दुष्प्रभावों के बारे में लोगों को शिक्षित करती हूँ। मैंने अनेक वर्षों से 223 स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक कार्यों को संबोधित किया है, और मैंने अपने सन्देश को प्रसारित करने के लिए रेडियो और टेलीविजन का उपयोग किया है। इन विषयों पर मेरे लेख भारत और विदेशों में विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में व्यापक रूप से प्रकाशित किए गए हैं।

जब मैंने 20 साल पहले काम करना शुरू किया, तो इन सामाजिक बुराइयों के बारे में कोई जागरूकता नहीं थी। अब सामान्य आबादी जागरूक है और सरकारी मशीनरी भी संवेदनशील है। लिंग अनुपात को सही करने के लिए कई स्तरों पर कदम लिए जा रहे हैं।

आपने लिखना कब और क्यों शुरू किया?

अपने मरीजों और उनकी मां के साथ बातचीत करते हुए, मुझे एहसास हुआ कि स्वास्थ्य और बच्चों के रोगों के बारे में कोई भी विश्वसनीय जानकारी जनता को अपनी भाषा में उपलब्ध नहीं थी। इसलिए मैंने पंजाबी में बच्चों की बीमारियों के बारे में लिखने का फैसला किया। इस प्रकार धीरे-धीरे लेखन विस्तार हुआ।

जब मैं अपने रोगियों और उनकी मां की दुखद कहानियां सुनती हूं, तो अपनी मानसिक पीड़ाएं दूर करने के लिए मैं उनकी कहानियां लिखती हूं। अपने पिता, जो एक महान पंजाबी लेखक थे, के आग्रह पर मैंने अभी तक 36 पुस्तकें लिखी हैं.

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