मादर***, बहन***, चू* – हम सभी इन शब्दों से वाकिफ़ हैं| इन सभी शब्दों में दो बातें सामान्य हैं| एक, स्त्रिद्वेष और दो, यह सभी गालियाँ सगोत्रगामी हैं| हम इन शब्दों को यदाकदा इस्तेमाल करते हैं, बिना इनके अर्थ पे कोई गौर फरमाये| कोई इन शब्दों के इस्तेमाल में सांस्कृतिक अपमान नहीं समझते||

कई लोगों का मानना है के इन शब्दों को अपमानजनक कह कर नारीवादी कुच्छ अति मचा रही हैं| उनका कहना है की शाब्दिक अर्थ पे ना जा कर इन शब्दों को किस समय इस्तेमाल किया जाता है उसपे ध्यान दिया जाना चाहिए| यह बात मुझे सोचने पे मजबूर कर देती है कि इन शब्दों के पहले इस्तेमाल के पीछे क्या सोच रही होगी| और क्या यह शब्द किसी व्यक्ति का अपमान करने या उसे नीचा दिखाने के लिए नहीं इस्तेमाल होते?

इस प्रभुत्व पदानुक्रम में लोकप्रिय मीडीया भी विशेष भूमिका निभाती है| यह सब जगह है- फिल्मों में, गानो में और तो और वीडियो गेम्स और सूपरहीरो कॉमिक्स में भी| इनमें नायक जो भी करे, आम इंसान बिना सोचे समझे उसका पालन अपने जीवन में करते हैं| मीडीया का तर्क है के वे वही बनाते है जो मार्केट में बिकता है| आख़िरकार, मार्केट्स ऐसे ही तो काम करते हैं| जो दिखता है, वो बिकता है||

पर हम ऐसी चीज़ों को क्यों पसंद करते हैं? शायद क्योंकि सच भी इससे कुच्छ मिलता जुलता सा है| हम एक समाज के रूप में स्त्रीद्वेषी हैं, बस ना जाने क्यों हम इस बात के इनकार में जी रहे हैं| मेरे कई मित्र मुझे पूछते हैं, “महिलाओं को अधिकारों की क्या ज़रूरत है? उनके पास तो मर्द से ज़्यादा विशेषाधिकार हैं| तुम लोगों को लॅडीस नाइट पर पार्टियों में मुफ़्त एंट्री और शराब मिलती है, हमे तो नहीं”|शायद पुरुष इसे लिंग के कारण होने वाले आर्थिक और शक्ति असंतुलन की तरह नहीं देख पाते, जिसका मैं इसे प्रतीक समझती हूँ| अपूर्वा रंजन, जो समाज सेवा और नारीवाद शिक्षा से जुड़ी हैं, इसे उपभोक्तावाद से जोड़ती हैं| उनका मानना है :

हम वही ख़रीदेंगे जो सबसे चमकीले ढंग से बिकेगा| गुणवत्ता के सन्दर्भ में हमारी समझ स्टार्स और अवॉर्ड्स तक सीमित है| किसी चीज़ को सामग्र रूप से देखने के बजाए हम केवल उन्ही हिस्सों पे फोकस करते हैं जिनपे हम करना चाहते हैं| जैसे हनी सिंह के गाने| हम सबको पता है की उनमें कितना स्टरिडवेष भरा होता है, पर हम सिर्फ़ धुन और बीट्स पर फोकस करते हैं||

गालियों को अपशब्द मानना या ना मानना पूर्णत: निजी चुनाव है, और हम उसपे सवाल नहीं उठा रहे| पर आशा है के तर्क और कारण के इस्तेमाल से हमने यह साबित कर दिया है कि यह शब्द अपने आप में स्त्रीद्वेषी हैं, चाहे उन्हे किसी भी भाव से इस्तेमाल किया जेया रहा हो||