छोटे शहरों से पढ़ कर अच्छी नौकरी पाने वाली लड़कियों में आज बांदा की प्रतीक्षा पांडे का नाम भी शामिल हो गया है। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से पढ़ाई कर समीक्षा अधिकारी बन जिले का नाम रोशन किया है। आज वह अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों के लिए एक प्रेरणा  बन गयी हैं, या फिर कह सकते है हीरो!

मेहनत और लगन से मंजिल होती है हासिल, मिलिए बांदा की प्रतीक्षा से जो इलाहबाद में समीक्षा अधिकारी हैं

हम जब प्रतीक्षा से मिलें, तो उन्होंने मुस्कुरा कर हमें बताया कि पढ़ने का शौक उन्हें बचपन से ही है, “हम 2000 में बांदा आए और तब से यहीं हैं। मैंने अपनी पढ़ाई बांदा से ही की है। मुझे बचपन से ही पढ़ने का शौक रहा है। कोर्स की किताबों के अलावा भी मुझे उपन्यास आदि पढ़ने का बेहद शौक रहा है।” प्रतीक्षा आज बांदा में ही कृषि अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं, और जल्द ही समीक्षा अधिकारी के पद को सम्भालने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट जाएंगी।

बुंदेलखंड जैसे पित्रसत्तात्मक समाज में एक लड़की को ऐसी उपलब्धियां हासिल करना कोई आसान बात नहीं है। प्रतीक्षा ये अच्छी तरह से जानती और पहचानती हैं, “जहां तक महिलाओं का नौकरी और पढ़ाई के क्षेत्र में आगे बढ़ने और आने वाली मुसीबतों का सवाल है तो वह तो तभी से शुरू हो जाती हैं जब महिलाएं घर से कदम बाहर रखती हैं।” वे बताती हैं कि उनके परिवार के सहयोग ने एक बहुत बड़ी भूमिका निभायी है। अपने घर-परिवार, दोस्त और ऑफिस के सहकर्मियों ने हर कदम पर उनका मनोबल बढ़ाया है, ये बात भी उन्होंने हमें बताई।

इन उचाईयों को छूने में, प्रतीक्षा अपने पिता को खासकर ज़िम्मेदार मानती हैं। स्वयं एक छोटे कसबे में पले बढ़े, उनके पिता ने हमें बताया कि वे दसवी कक्षा के बाद पढ़ नहीं पाए थे क्योंकि उनके घर वाले उनकी पढ़ाई का खर्चा नहीं दे सके। अपने पैरों पर खड़े होकर, जब उन्होंने शादी रचाई, तभी से उन्होंने मन में ये ठान लिया था कि वे अपने बच्चों की शिक्षा में कोई कमी नहीं आने देंगे।

महत्वकांक्षी प्रतीक्षा का सपना आईएएस बनने का है और अब वह उसके लिए तैयारी करने का मन बना चुकी हैं। इलाहाबाद जाने से पहले, उन्होंने बांदा और अन्य जगहों की युवा पीढ़ी, और ख़ास लड़कियों, के लिए एक सन्देश दिया, “घबराने से नहीं, बल्कि स्थिति का सामना करने से ही हमें अपनी मंजिल मिल सकती हैं।”