केरला के लॉर्ड अयप्पा के सब्रिमाला के मंदिर मे, महिलाए जो अपने जीवन के मासिक धर्म से गुजरती है उनको प्रवेश नही दिया जाता. मंदिर मे साल मे १० लाख से भी ज़्यादा मर्द आते है. हमेशा से यही चलता आ रहा है अब तक, हाल ही मे त्रवांकोर देवस्वोम बोर्ड अध्यक्ष, प्रयार गोपालकृष्णन, ने राज्य का ध्यान आकर्षित किया जिससे कोटा समस्या अस्तित्व में तब से हमेशा के लिए आई. उन्होने भनभनाहट निर्माण की ये केह्कर, “एक समय आएगा जब लोग पूछेंगे की क्या पूरे साल के लिए महिलाओ को मंदिर मे आने से अस्वीकृत किया जाए.”

उन्होने यह भी कहा की, “आज के युग मे यंत्र है जो शव और हथियार जाँच कर सकते है. एक दिन आएगा जब ऐसा यंत्र का आविष्कार होगा जो जाँच कर पाएगा की यह ‘सही समय’ है महिलाओ का मंदिर मे प्रवेश करने के लिए. जब उस यंत्र का आविष्कार होगा, उस समय हम बात करेंगे महिलाओ के प्रवेश के बारे मे”. शायद मिस्टर प्रयार सोचते है की महिलाओ का  गर्भाशय यह एक शस्र है. या फिर, ऐसा इनसान जो हर समय स्री जाति से द्वेष करनेवाला, जो धर्म के घूंघट मे छिपकर फूट डालके नष्ट करता है.

‘फूल का खिलना’ यह रूपक ईस्तमाल किया जाता है मासिक धर्म को सूचित करने के लिए. सरल जीवविज्ञान के अनुसार, यह शरीर का एक तरीका है अंडे को बाहर निकालना जो खाद नही डाल सकता, और महिलाओ का शरीर हर एक महीने मे एक अंडा उत्पादित करता है. यह प्रकृति की देन है महिलाओ को जिससे मर्द मुकर नही सकते और वो महिलाओ को रोक नही सकते और उन्हे अशुध नही बुला सकते जो एक कुसुमित थैली को लेके घूम रहे है अपने शरीर मे. उल्लेख नहीं करना, जो स्वाभाविक रूप से दर्द और असुविधा होती है इस दर्द की वजह से.

पूरे देशभर से महिलाओ ने इस मंच पर अपने मतभेद जताए और भी बाकी मासिक धर्म के पहलुओ पर और उसके संस्कृति पर जो इंडिया मे चली आ रही है. जहा कुछ महिलाओ ने अपना गुस्सा जताया ब्लू लिक्विड के विज्ञापन पर और उसे शर्मनाक संस्कृति कहा, वही कुछ महिलाओ ने आकर्षक मुहावरों का सहारा लिया इस विषय को मुख्य आकर्षण मिलने के लिए.

“खून तूने बहाया तो

बहादुर चरित्र,

खून मैने बहाया तो

मे अपवित्र”

कॅंपेन मे काफ़ी सारे लोग थे जो अपना असंतोष व्यक्त कर रहे थे और बोल रहे थे की मासिक धर्म से महिलाओ को ख्सूही नही मिलती बल्कि वह दर्दनाक और भावुक अनुभव है जिससे महिलाओ को जिंदगीभर गुज़रना पड़ता है. कुछ लोगो ने ये भीकहा की इस विषय पर कोई खास सूचना या उपाय भी नही है, एक हानिरहित समाधान ऐंठन और अवज्ञा का के लिए.

निकिता आज़ाद, एक कॉलेज जानेवाली छात्रा जिन्होने ये कॅंपेन चालू किया, बीबीसी से कहा की महिलाओ को अधिकार होना चाहिए, ‘जहा चाहिए वहा जाने का और जब चाहिए जाने का’. मंदिर के नये चुने गये मुख्य के टिप्पणी के बारे मे उन्होने कहा की ऐसी टिप्पणी महिलाओ के आस पास के मिथकों मजबूत बनाती है.

अर्जुन उन्नीकृष्णन जो ‘लेट्स टॉक अबौट मेन्स्ट्रवुशन’ के सह-संस्थापक है अपने साथ #स्मश्पत्रियारची लाए जिससे काफ़ी मर्द एकजुट होकर #हॅपीतोब्लीड कॅंपेन मे सहभागी हो और आवाज़ उठाए बाकी मर्दो के साथ मिलकर मासिक धर्म के वर्ज्य के खिलाफ.

हम विशुद्ध और अपवित्र को कैसे देखते है यह हमारे खुद के दिमाग़ पे निर्भय होता है, अपने खुद के अनुभव से बाहर आके. इस युग के बदलते और गति से बढ़ने वाले नागरिक होने के कारण, हमे अपने आपसे ये पूछना चाहिए की, क्या हमे बरसो पुरानी रीति रिवाज़ का पालन करना चाहिए या परिस्थिति के अनुसार उसका हल निकालना चाहिए व्यक्तिपरक सबूत के आधार पर.