उर्वशी बुटालिया भारत की सबसे पहले नारीवादी  (फेमिनिस्ट) प्रकाशकों में से एक है-  इन्हे ४० साल से भी ज्यादा प्रकाशन का अनुभव है. 1984 में ऋतू मेनोन क साथ मिलकर ‘काली फॉर वीमेन’ की सह-संस्थापना की.

आखिर किस तरह हुई भारत में नारीवादी प्रकाशकों की शुरुवात?

उर्वशी बुटालिया

1984 में एक दिलचस्प समय के दोरान ‘काली फॉर वीमेन’ की शुरुवात हुई | जब महिला आंदोलन अपने शिखर पर था, दहेज़ प्रथा, बलात्कार कानूनों के जैसे मुद्दे उठाए जा रहे थे| हम में से कई सारा लोग इसका भाग रहे थे| हमें कई सवालों का सामना करना पड़ा था- जैसे की आखिर इन सरे मुद्दों की शुरुवात कैसे हुई, दहेज़ प्रथा , एक प्रथा कैसे बनी|

इसके के सन्दर्भ में तब तक कोई भी साहित्य प्रकाशित नहीं हुआ था| ऐसा कुच्छ भी नहीं था जिससे पढ़ कर हम आधार, प्रसंग, इतिहास ग्रहण कर सके| 70 के दशक में जब मैं “ओ यू पी” के साथ काम किआ करती थी, तब महिलाओं द्वारा लिखे हुए महिला साहित्य की कमी देख कर मैं काफी असंतुष्ट रहती थी |

इसी तरह के सवाल महिला आंदोलन के समय उठने लगे | विचार में तो यही था की अगर मुख्या धारा से सम्बंधित प्रकाशकों को इसमें कोई रूचि नहीं थी, तो क्यों न मैं ही यह करु | उस समय मैं युवा रोमांच से भरी भी थी, तभी अपनी नौकरी छोड़ दी और यह काम शुरू किया|| अगर उस समय साहित्य होता तो फिर यह शरुवात नहीं हो पाती| मेरे लिए उस समय अच्छी बात यह थी कि महिला आंदोलन में मेरी राजनैतिक भागीदारी और प्रकाशन में मेरा पेशा बहुत खूब संगठित हुए ||

जबसे कुछ क्षण हमारे लिए महत्वपूण रहे हैं ,जैसे की- 90 के दशक की शरुवात में जब प्रकाशन का की सूरत भारत में बदलना शरू हुई| इसकी की शरुवात तब हुई जब हम एक ब्रिटिश शासक, पूर्व- औपनिवेशक  प्रकाशन उद्योग से भारतीय प्रकाशन उद्योग में संक्रमित होना शुरू हुए| इसका मतलब है की ब्रिटिश कंपनी जा रही थी क्योंकि उस समय  हमारे पास साहित्य की काफी कमी थी खास तौर पर अंग्रेजी में, इसलिए आयात काफ़ी ज़्यादा था| फिर 90 के शुरुआती दशक में ही रुपये के मुकाबले डॉलर काफी महंगा हो गया और साथ ही में किताबों पर लगने की आयात लागत भी|

और फिर आया वो समय जब भारत में विदेशी पूंजी का प्रवेश हुआ| अब तक कई भारतीय प्रकाशन गृह काफी दिलचस्प काम कर रहे थे पर अब बड़े प्रकाशक भी मार्केट में प्रवेश कर रहे थे, और काफी सारे लेखकों को प्रकाशित कर रहे थे| वह एक अलग तरह की प्रतियोगिता थी ||

Urvashi Butalia speaks with Amrita Tripathi