किशोरी स्वास्थ्य योजना के तहत किशोरियों को आयरन की गोली और टीकाकरण निशुल्क मिलना चाहिए कहती है खबर लहरिया की रिपोर्ट । इसके अलावा हर महीने सेनेटरी नैपकीन देने की योजना भी इसीके अंतर्गत है। ये योजना महिला और बच्चों के स्वास्थय मंत्रालय द्वारा नियुक्त की गई है, और अलग राज्यों में इसे चलाया जा रहा है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश दो ऐसे प्रांत हैं जहां इस योजना की सफलता पर सालों से बात चीत चलती आ रही है।

इस योजना की ज़मीनी हकीकत जानने के लिए हमने बुंदेलखंड के कुछ पिछडे इलाके में रिपोर्टिंग की।

अम्बेडकर नगर के गांव सोनावा में हम किशोरियों और जवान लड़कियों से मिलें, और उनसे पूछा कि वे इस योजना के बारे में कितना जानती हैं, और इस योजना से उनको क्या लाभ मिल रहें हैं?

लेकिन योजना पर जानकारी यहां किसी को नहीं थी, सिर्फ लड़कियां ही नहीं, मगर उनके माता-पिता या अन्य लोगों को भी इसके बारे में कुछ पता नहीं था।

योजना के निर्माण ये बात शामिल थी की इसकी जानकारी गांव में काम करने वाली सरकारी कर्मचारी, जो आशा कार्यकर्ता होती हैं, लोगों तक पहुंचाए। इन्हें गांव में आशा बहु के नाम से जाना जाता है।

किशोरियों को आयरन, कैल्शियम, और सेनेटरी पैड बाटने के काम भी आशा बहु के ही नाम है। इस बारे में अम्बेडकरनगर की आशा कार्यकर्ता रीता का कहना है कि पैड वितरण पर कोई शुल्क नहीं लिया जाता। “हालांकि उस पैकट पर कुछ दाम लिखा हुआ है लेकिन यहाँ निशुल्क पैड दिए गये हैं”, वे कहती हैं। लेकिन ये नियमित रूप से हो रहा है। इस बात पर उन्होंने साफ़ कहा, “एक बार ही यहां पैड उपलब्ध हुए तो एक बार ही बाटें गये।”

लेकिन माहवारीतो हर महीने आता है, हमें पुछा? पर इस बात पर उन्होंने जवाब नहीं दिया। वहीँ, फैजाबाद की आशा कार्यकर्ता संतोष पाण्डेय ने तो अपनी निराशा बयान करते हुए कहा कि उनके गांव में आजतक एक बार भी पैड नहीं आया, “एक भी पैकेट नहीं”। इसके अलावा, आयरन और कैल्शियम गोलियों का भी नाम-ओ-निशान स्वास्थय केंद्र में उन्होंने कभी नहीं देखा। “साल भर होने को आ गया पर यहां कुछ भी नहीं आया।” संतोष जी ने बताया की वे खुद जिला अस्पताल जाकर किशोरियों के लिए ये सामान लाती हैं, पर इसे निशुल्क नहीं दे सकती हैं। “आखिर हमारे आने-जाने का किराया भी तो है, उसका भुगतान कैसे होगा?” कुछ मूल्य पर वे पैड देती हैं।

कम दाम में पैड खरीदने वाली लडकियां गांव में अनेक हैं, माहवारी से जुडी दिक्कतों और सामाजिक रोक-टोक से परेशान, अब ग्रामीण स्तर पर भी लडकियां पैड के लिए क्रांति करने को तैयार हैं, पर सरकारी योजनाओं का सहायता उनको नहीं मिलता है।

टंडौली फैजाबाद के 15 साल की पुष्पा को आयरन की गोलियों के बारे में, या अन्य मुफ्त सुविधाओं के बारे में संज्ञान नहीं है, पर पैसे देकर पैड दिए जाने की बात उन्होंने बताई।

अम्बेडकरनगर की संजू देवी ने बतलाया की जो कोई भी उन्हें “उन दिनों की साफ-सफाई” के बारे में बताता है, बे तुरन्त अपनी बेटी को बता देती हैं। “इसके अलावा, बेटी को स्कूल में जानकारी मिलती है, और वो भी हमको बताती है।”

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक अंशुमान गुप्ता का इस बारे में कहना है कि जो चीज़ उपलब्ध होती है, वे उसे बांट देते हैं। “जैसे अभी हम आयरन और कैल्शियम की गोलियों को बांट रहे हैं क्योंकि अभी यही उपलब्ध हैं हमारे पास। पैड तो अभी यहाँ काफी कुछ महीनों से नहीं दिए जा रहे।”

खबर लहरिया